पटना: बिहार शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉ. एस. सिद्धार्थ ने शिक्षकों और बच्चों से जुड़े कई सवालों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि एक अशिक्षित बच्चा पूरे गांव के लिए चुनौती बन सकता है। समाज को इस दिशा में पहल करनी होगी। यदि स्कूल के समय कोई बच्चा सड़क पर दिखे, तो उसे स्कूल भेजने की जिम्मेदारी गांव और समाज की बनती है। पंचायत प्रतिनिधियों से इसमें मदद की अपील की गई है।

1 अप्रैल से बच्चों को ड्रेस और किताबें मिलेंगी

डॉ. एस. सिद्धार्थ ने बताया कि शिक्षा विभाग का लक्ष्य है कि 1 अप्रैल से सरकारी स्कूलों में भी बच्चों को ड्रेस और किताबें समय पर उपलब्ध कराई जाएं। जैसे निजी स्कूल के बच्चे 1 अप्रैल को नई कक्षा में जाने के साथ सामग्री प्राप्त करते हैं, वैसा ही सरकारी स्कूलों में भी होगा। प्रयास है कि नई क्लास में प्रवेश के दिन या तुरंत बाद नई ड्रेस दी जाए। 1 अप्रैल 2025 से यह व्यवस्था लागू होगी।

स्कूल में मोबाइल लाना अनुचित

स्कूल में मोबाइल लाने पर सवाल पर उन्होंने कहा कि यह गलत है। अभिभावकों को बच्चों को मोबाइल न देने की सलाह दी गई है। शिक्षक यदि बच्चों के पास मोबाइल देखें तो इसे अपने पास रख सकते हैं और बाद में लौटा सकते हैं। हालांकि हर दिन इसकी जांच संभव नहीं है।

प्रयोगशाला में क्लास लेना अनुचित

सरकारी स्कूलों में प्रयोगशाला का सही उपयोग करने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि लैब में पढ़ाई न कराई जाए। जांच के दौरान सिवान के एक स्कूल में प्रयोगशाला में क्लास चलते पाए गए थे, जो उचित नहीं है। यदि इसे सुधारा नहीं गया तो कार्रवाई की जाएगी।

मध्याह्न भोजन के लिए कुर्सी-टेबल संभव नहीं

मध्याह्न भोजन के लिए अलग कमरे या कुर्सी-टेबल की मांग पर डॉ. सिद्धार्थ ने कहा कि अभी सरकार बच्चों के बैठने के लिए बेंच-डेस्क की व्यवस्था कर रही है, जो पहले से ही चुनौतीपूर्ण है। इतने बच्चों के लिए कुर्सी-टेबल लगाना बेहद खर्चीला है। जमीन पर बैठकर खाना पंगत का आनंद देता है और सामूहिक भावना को मजबूत करता है।

शिक्षकों के लिए अलग ड्रेस की जरूरत नहीं

एक शिक्षक ने शिक्षकों के लिए भी ड्रेस कोड लागू करने की बात उठाई। इस पर डॉ. सिद्धार्थ ने कहा कि जींस-टीशर्ट जैसे परिधान में स्कूल नहीं आना है, लेकिन अलग ड्रेस लागू करना उचित नहीं है। शिक्षकों को ड्रेस के लिए स्वतंत्रता दी गई है। बच्चों की तरह शिक्षकों के लिए यूनिफॉर्म की कोई योजना फिलहाल नहीं है।

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