रांची: झारखंड के राजनीति में एक नया मोड़ आया है, जहां पूर्व विधायक और दिशोम गुरु शिबू सोरेन की बड़ी बहू, सीता सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) में वापसी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। एक ओर जहां भाजपा नेताओं ने इस विषय पर चुप्पी साध रखी है, वहीं झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता का बयान इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण हो सकता है।

मनोज पांडेय का बयान

सीता सोरेन की वापसी को लेकर झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता मनोज पांडेय ने अपनी बात रखते हुए कहा कि “झामुमो में सीता सोरेन के प्रति कभी भी असम्मान की भावना नहीं रही है।” उनका कहना था कि यदि हेमंत सोरेन या शिबू सोरेन की इच्छा होगी तो कोई भी पार्टी में शामिल हो सकता है, और सीता सोरेन तो इस घर की बहू हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हम लोगों ने कभी भी उनके खिलाफ कोई अपमानजनक बातें नहीं कीं। पांडेय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सीता सोरेन पार्टी में आती हैं और उनकी वापसी से पार्टी को मजबूती मिलती है तो उनका स्वागत है।

भाजपा का रुख: चुप्पी बरकरार

सीता सोरेन की झामुमो में वापसी के बारे में भाजपा प्रवक्ता ने कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी। पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव से पहले सीता सोरेन ने झामुमो छोड़ भाजपा में शामिल होने का निर्णय लिया था। इस समय जब उनकी फिर से झामुमो में लौटने की चर्चा हो रही है, भाजपा के प्रवक्ताओं ने इस पर कोई भी बयान देने से बचते हुए कहा कि चम्पाई सोरेन और सीता सोरेन पार्टी की वरिष्ठ नेता हैं। हालांकि, अखबारों में सीता सोरेन का इंटरव्यू छपा है, लेकिन भाजपा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक वक्तव्य नहीं आया है।

झामुमो का ऐतिहासिक स्थापना दिवस समारोह

2 फरवरी को दुमका के गांधी मैदान में होने वाले झामुमो के 46वें स्थापना दिवस समारोह को पार्टी ऐतिहासिक मान रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि इस बार के स्थापना दिवस के समारोह में उत्साह और जोश अधिक दिखाई दे रहा है। झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता ने कहा कि “दुमका में शायद यह एकमात्र ऐसा स्थान होगा, जहां पार्टी के स्थापना दिवस पर अपने प्रिय नेता के विचार सुनने के लिए लोग ठंडी रात में भी जागते हैं।”

सीता सोरेन की वापसी के राजनीतिक मायने

सीता सोरेन की वापसी की चर्चा ने झारखंड की राजनीति में नया मोड़ लिया है। उनके झामुमो में लौटने से पार्टी को एक नया ऊर्जा मिल सकती है, खासकर ग्रामीण इलाकों में उनकी पकड़ को देखते हुए। यदि वे वापस आती हैं, तो यह झामुमो के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम साबित हो सकता है। अब देखना होगा कि भाजपा इस नई स्थिति का किस तरह से सामना करती है और क्या वह अपनी रणनीति में बदलाव करती है।

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