नई दिल्ली: भारत में मंदिरों में वीआईपी एंट्री का चलन बहुत पुराना है। इस पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। अब अदालत ने इस याचिका को लेकर किसी प्रकार का आदेश पारित करने से मना कर दिया है। इस मामले की सुनवाई देश के मुख्य न्यायधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने की। अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही वे इस मुद्दे से सहमत हों, फिर भी इस पर कोई आदेश या दिशानिर्देश जारी करना उचित नहीं समझते। हालांकि, अदालत ने यह जरूर कहा कि राज्य सरकारें इस मामले में उचित निर्णय ले सकती हैं। आइए इस मामले को विस्तार से समझते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका का सार

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में वीआईपी दर्शन के लिए अतिरिक्त शुल्क वसूलने और कुछ खास वर्ग को विशेष प्राथमिकता देने के खिलाफ जनहित याचिका पेश की गई थी। इसमें यह आरोप लगाया गया था कि मंदिरों में वीआईपी संस्कृति के कारण कुछ लोगों को तरजीह दी जाती है और उनके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। इस याचिका पर अदालत ने कोई भी निर्णय देने से इनकार किया। मुख्य न्यायधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर निर्णय समाज और मंदिर प्रशासन को लेना चाहिए, अदालत को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि भले ही उन्हें यह मुद्दा गलत लगता हो, लेकिन इस पर आदेश जारी करना उनके अधिकार में नहीं है।

याचिका में क्या कहा गया था?

याचिका दायर करने वाले वकील आकाश वशिष्ठ ने तर्क दिया कि 12 ज्योतिर्लिंगों के कारण कुछ मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) की आवश्यकता है। उनका कहना था कि वीआईपी दर्शन की व्यवस्था पूरी तरह से अव्यवस्थित और मनमानी है। इस मामले में वृंदावन के श्री राधा मदन मोहन मंदिर के विजय किशोर गोस्वामी ने भी याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा कि मंदिरों में वीआईपी कल्चर संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है, क्योंकि यह पैसे के आधार पर असमर्थ भक्तों के साथ भेदभाव करता है, खासकर वंचित महिलाओं, विकलांग व्यक्तियों और वरिष्ठ नागरिकों के मामले में।

न्यायालय का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे इस मुद्दे पर कोई निर्देश जारी नहीं कर सकते हैं। अदालत ने कहा कि मंदिरों में वीआईपी दर्शन को लेकर जो भी कदम उठाए जाएं, वह मंदिर प्रबंधन और समाज द्वारा तय किए जाने चाहिए।

अदालत ने यह माना कि इस मामले में अदालत का कोई हस्तक्षेप उचित नहीं होगा और इसे समाज पर छोड़ दिया गया है। अब यह देखना होगा कि राज्य और मंदिर प्रशासन इस पर क्या निर्णय लेते हैं।

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