पटना: बिहार विधानसभा चुनाव के लिए गिनती शुरू हो गई है। चुनाव में अब सिर्फ कुछ महीने बचे हैं। ऐसे में नीतीश सरकार अपनी छवि सुधारने और जनता के गुस्से को शांत करने में लगी हुई है। हाल ही में हुए कुछ विवादों ने सरकार को बैकफुट पर ला दिया है। भूमि सर्वे, स्मार्ट मीटर, और शिक्षकों के स्थानांतरण जैसे मुद्दों ने आम जनता में असंतोष बढ़ाया। इस स्थिति को संभालने के लिए नीतीश सरकार ने बड़े फैसले लिए हैं।
प्रचार के सहारे नीतीश सरकार
नीतीश कुमार अक्सर कहते हैं कि वह “काम में विश्वास करते हैं, प्रचार-प्रसार में नहीं।” लेकिन अब सरकार ने बड़े पैमाने पर विज्ञापन का सहारा लिया है। विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और जनता में सरकार के खिलाफ गुस्सा है। इस स्थिति को संभालने के लिए अखबारों में पूरे पन्ने के विज्ञापन दिए जा रहे हैं। हाल ही में ऊर्जा विभाग की तरफ से एक विज्ञापन जारी किया गया, जिसमें किसानों को राहत की बातें कही गईं। इसमें बताया गया कि कृषि कार्य के लिए बिजली बिल बेहद मामूली है। प्रति यूनिट बिजली का अधिकांश खर्च सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करती है। किसानों को कृषि कनेक्शन लेने के लिए प्रेरित किया जा रहा है ताकि हर खेत तक सिंचाई का पानी पहुंचे।
भूमि सर्वेक्षण पर रोक
भूमि सर्वे को लेकर नीतीश सरकार ने बड़ा फैसला किया है। जनता के गुस्से को देखते हुए सर्वे कार्य को धीमा कर दिया गया है। सरकार ने 31 मार्च तक स्वघोषणा पत्र जारी करने की छूट दी है। अंदरखाने की खबर है कि यह काम 2025 के चुनाव के बाद ही तेज होगा। भूमि सर्वेक्षण का कार्य आसान नहीं है। कागजात जुटाने में लोगों को परेशानी हो रही है। इससे जनता में असंतोष बढ़ा है। सत्ताधारी गठबंधन को लगता है कि चुनाव से पहले सख्ती से नुकसान होगा। हालांकि, बीजेपी ने सर्वेक्षण को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताई है।
विवाद खत्म करने की रणनीति
सरकारी स्कूल शिक्षकों की छुट्टी और स्थानांतरण का मुद्दा भी चर्चा में था। शिक्षकों और उनके परिवारों में इस फैसले के कारण नाराजगी थी। विधायकों ने इस मसले को नेतृत्व तक पहुंचाया। चुनाव में नुकसान से बचने के लिए सरकार ने शिक्षकों की छुट्टी बहाल कर दी और स्थानांतरण के मुद्दे पर नरमी दिखाई।
डैमेज कंट्रोल की कोशिशें
नीतीश सरकार हर विवाद को शांत करने की कोशिश कर रही है। बड़े फैसलों को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। इसके साथ ही जनता के आक्रोश को कम करने के लिए प्रचार-प्रसार का सहारा लिया जा रहा है। लेकिन क्या सिर्फ विज्ञापन के सहारे नीतीश सरकार अपनी चुनावी नैया पार लगा पाएगी? यह आने वाला समय ही बताएगा।
































