पटना: बिहार के उपचुनाव में राजनीतिक सरगर्मियाँ तेज हो गई हैं, और सभी की नजरें 23 नवंबर को होने वाली वोटों की गिनती पर टिकी हैं। गया के इमामगंज और बेलागंज, भोजपुर के तरारी, कैमूर के रामगढ़ में 13 नवंबर को उपचुनाव आयोजित किए गए थे। इसे 2020 के विधानसभा चुनाव से पहले का सेमीफाइनल माना जा रहा है, और इसमें एक नया नाम प्रशांत किशोर का भी है। उनकी जन सुराज पार्टी ने इस चुनाव में अपना पूरा जोर लगाया है, ताकि बिहार की बंटी हुई राजनीति में अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकें।

परिवारवाद की प्रतिष्ठा दांव पर

आम धारणा के अनुसार, इमामगंज, बेलागंज, तरारी और रामगढ़ में मुख्य मुकाबला महागठबंधन (इंडिया अलायंस) और एनडीए के बीच है। इनमें से तीन सीटें महागठबंधन के पास हैं, जबकि एक सीट एनडीए के खाते में है। महागठबंधन के लिए इन सीटों को बचाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। परिवारवाद की राजनीति बिहार में अहम मुद्दा रही है, और इन उपचुनावों में इसे लेकर भी चर्चा हो रही है।

इमामगंज: दीपा मांझी की चुनौती

गया जिले की इमामगंज विधानसभा सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की बहू दीपा मांझी चुनावी मैदान में हैं। मांझी ने किसी पार्टी कार्यकर्ता को नहीं, बल्कि अपनी बड़ी बहू को अपनी विरासत सौंपने का निर्णय लिया। दीपा के पति संतोष सुमन बिहार सरकार में मंत्री हैं, और उनका परिवार केंद्र और राज्य की राजनीति में अहम स्थान रखता है।

बेलागंज: सुरेंद्र यादव का गढ़ या बदलाव?

गया जिले की बेलागंज सीट को पहले राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का मजबूत गढ़ माना जाता था, जहां से सुरेंद्र यादव का दबदबा था। अब जब सुरेंद्र यादव लोकसभा चुनाव जीतकर संसद चले गए हैं, तो उनकी विरासत उनके बेटे विश्वनाथ यादव को मिली है। यह सीट जीतने के लिए लालू यादव और तेजस्वी यादव ने भी प्रचार किया, और इस बार आरजेडी की प्रतिष्ठा दांव पर है।

रामगढ़: जगदानंद सिंह की प्रतिष्ठा

कैमूर जिले की रामगढ़ सीट पर आरजेडी के बिहार अध्यक्ष जगदानंद सिंह की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। इस सीट से उनके छोटे बेटे सुधाकर सिंह विधायक थे, लेकिन अब वह बक्सर से सांसद बन गए हैं। जगदानंद सिंह ने इस बार अपने बड़े बेटे अजीत सिंह को टिकट दिया है। यह चुनाव न सिर्फ अजीत के लिए, बल्कि उनके पिता और भाई की प्रतिष्ठा के लिए भी अहम साबित हो सकता है।

तरारी: सुनील पाण्डे का परिवारवाद

भोजपुर जिले की तरारी सीट पर बाहुबली नेता सुनील पाण्डे की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। हालांकि, पिछले दो चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा है, इस बार उनके बेटे विशाल प्रशांत को बीजेपी ने टिकट दिया है। विशाल की जीत सुनिश्चित करने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और अन्य वरिष्ठ बीजेपी नेता भी प्रचार में लगे हैं। अगर विशाल हारते हैं, तो यह सुनील पाण्डे के लिए बड़ा झटका होगा।

बिहार का सियासी सेमीफाइनल

इन उपचुनावों से स्पष्ट होगा कि बिहार की राजनीति में किसका दबदबा कायम है। महागठबंधन के नेता जहां अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने की कोशिश करेंगे, वहीं एनडीए और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी भी अपनी ताकत दिखाने के लिए पूरी कोशिश करेंगी। यह उपचुनाव बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए एक अहम संकेतक साबित हो सकते हैं।

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