पटना: बिहार के भू एवं राजस्व मंत्री ने भूमि सर्वे की शुरुआत को एक बड़ी पहल बताया है, जो लोगों के लिए सुविधाजनक होगी। लेकिन असलियत यह है कि इस प्रक्रिया ने जनता के लिए और भी मुश्किलें पैदा कर दी हैं। हाल ही में मंत्री जी ने एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई, जो उनके लिए कोई नई बात नहीं थी, लेकिन जनता के लिए यह एक विशेष अवसर था।
बैठक के दौरान, यह स्पष्ट हो गया कि उनके नियंत्रण में क्या समस्याएं चल रही हैं। हालांकि, मंत्री जी ने इस सब के बावजूद बैठक में सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराई और फिर चले गए। उनके बड़े दावों के बावजूद, जब वास्तविकता का सामना करने का समय आया, तो वे कुछ नहीं कह पाए।
शायद मंत्री जी का जनता से सीधा संपर्क नहीं है, क्योंकि वे विधायकों द्वारा चुने गए हैं और इससे उन्हें आम लोगों की समस्याओं का सही अंदाजा नहीं है। उनके पास विभाग चलाने का अनुभव भी सीमित है, इसलिए वे इसे पार्टी की नियमित बैठक समझने लगे हैं।
जमीन सर्वे में न केवल रैयतों, बल्कि सर्वे कर्मियों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कागजात प्राप्त करने में भू स्वामियों को परेशानी हो रही है, और अंचल अधिकारी भी इस स्थिति को सुधारने में असफल हैं। विभाग ने 170 अंचल अधिकारियों को पटना बुलाकर समीक्षा बैठक की, जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
बैठक में पता चला कि दाखिल-खारिज के आवेदन तेजी से अस्वीकृत हो रहे हैं। नया ऑनलाइन पोर्टल, “परिमार्जन प्लस,” भी इस समस्या का समाधान नहीं कर सका। यदि कोई भूमि मालिक ऑनलाइन आवेदन करता है, तो उसे अस्वीकृत किया जाता है, और इसका एकमात्र कारण है कि उसे कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ेंगे या अधिकारियों को संतुष्ट करना होगा।
हाल ही में हुई समीक्षा बैठक में ये आंकड़े सामने आए कि सीतामढ़ी के सुप्पी अंचल में 47.93 फीसदी आवेदन अस्वीकृत हुए, जबकि पटना के पंडारक में यह दर 44 फीसदी थी। बेगूसराय का साम्हो अखा कुरहा तीसरे स्थान पर था। जब अधिकारियों से इस पर सवाल पूछा गया, तो कोई ठोस जवाब नहीं मिला।
क्या मंत्री जी को पहले से इस स्थिति की जानकारी थी? अगर नहीं, तो अब क्या कोई जांच की जाएगी? यह सवाल अब भी अनुत्तरित है, और यह समस्या पूरे बिहार में फैली हुई है। मंत्री जी को इस पर विचार करना होगा, लेकिन उनके कार्यों से ऐसा लगता नहीं कि वे कोई ठोस कदम उठाएंगे।
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