पटना: विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार, महिषासुर के आतंक से देवलोक में हाहाकार मच गया था, जिसके वध के लिए मां दुर्गा को चंडी का रूप धारण करना पड़ा। लेकिन संथाल आदिवासी समाज में इसके विपरीत एक मान्यता है, जिसमें महिषासुर को उनका इष्ट और पूर्वज माना जाता है। उनका मानना है कि मां दुर्गा ने उन्हें छल से मारा है।

इसलिए, संथाल परगना में दशहरा मेला के दिन आदिवासी लोग सैन्य वेश में पहुंचकर अपना आक्रोश प्रकट करते हैं। वे मानते हैं कि उनके इष्ट महिषासुर को धोखे से मारा गया। महिषासुर का वास्तविक नाम महिषा सोरेन है।

मेले में सुरक्षा के विशेष इंतजाम

इस आक्रोश से बचने के लिए मेले में सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए जाते हैं। बलबड्डा में पिछले दो सौ वर्षों से आयोजित होने वाले इस मेले में आदिवासी समाज के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। वे पहले सैनिक लिबास में प्रदर्शन करते हैं और मूर्ति विसर्जन के समय भीड़ पंडाल में पहुंचकर कहते हैं, “बता-बता मेरा महिषा कहां है?” इसके बाद पुजारी उन्हें समझाते हैं कि उनके इष्ट का वध नहीं हुआ, बल्कि उन्हें मुक्ति दी गई है।

प्राचीन मेला सदियों से चला आ रहा है

गोड्डा जिले का यह प्राचीन मेला सदियों से चला आ रहा है। यहां बेहतर प्रदर्शन करने वाली आदिवासी टोली को मेला आयोजन समिति द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। स्थानीय पत्रकार प्रेमशंकर मिश्रा का कहना है कि यह परंपरा बहुत पुरानी है और इसमें सांकेतिक विरोध प्रकट होता है, जो संथाल क्षेत्र के अधिकांश गांवों में देखा जाता है।

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