पटना: बिहार में हाल ही में तिरहुत स्नातक एमएलसी उपचुनाव का परिणाम जारी हुआ, जिसमें एनडीए को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद एनडीए के भीतर विवाद शुरू हो गया है। जेडीयू नेता आनंद मोहन ने राजपूत समाज की अनदेखी का आरोप लगाते हुए अपनी ही पार्टी पर निशाना साधा।
राजपूत समाज की उपेक्षा का आरोप
आनंद मोहन ने कहा कि यह चुनाव किसी के अहंकार की भेंट चढ़ गया। उन्होंने राजपूत समाज से जुड़े नेताओं जैसे सांसद वीणा सिंह, विधायक राजू सिंह, अरुण सिंह, अशोक सिंह, और संजय सिंह की उपेक्षा पर सवाल उठाया। इसके अलावा, शिक्षकों में स्मार्ट मीटर और जमीन सर्वे को लेकर नाराजगी का जिक्र भी किया। उन्होंने कहा कि सरकार को शिक्षकों की मांगों पर ध्यान देना चाहिए।
स्मार्ट मीटर और जमीन सर्वे से असंतोष
आनंद मोहन ने कहा कि स्मार्ट मीटर को लेकर लोगों में आक्रोश है। वहीं, जमीन सर्वे ग्रामीणों के बीच झगड़ों का कारण बन रहा है। उन्होंने पार्टी को आत्ममंथन और हार की समीक्षा करने की सलाह दी। उन्होंने तिरहुत स्नातक सीट पर जेडीयू और एनडीए की हार को दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
तिरहुत स्नातक एमएलसी उपचुनाव परिणाम
5 दिसंबर को शिवहर, वैशाली, सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर में मतदान हुआ। 9 और 10 दिसंबर को मतगणना हुई, जिसमें निर्दलीय शिक्षक नेता वंशीधर ब्रजवासी ने जीत दर्ज की। जन सुराज पार्टी के विनायक गौतम दूसरे और आरजेडी के गोपी किशन तीसरे स्थान पर रहे। जेडीयू के अभिषेक झा चौथे स्थान पर रहे।
वंशीधर ब्रजवासी की जीत और कहानी
वंशीधर ब्रजवासी ने जीत के बाद नीतीश सरकार को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने अगर उन्हें नौकरी से बर्खास्त नहीं किया होता, तो आज वे एमएलसी नहीं बनते। उनकी बर्खास्तगी ने शिक्षकों को एकजुट कर दिया और इसका परिणाम उनकी जीत के रूप में सामने आया।
ब्रजवासी का संघर्ष और शिक्षकों का समर्थन
वंशीधर ब्रजवासी पहले मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय, रक्सा पूर्वी में शिक्षक थे। वे शिक्षकों के संघ के अध्यक्ष थे और उनकी मांगों के समर्थन में आंदोलन करते थे। शिक्षा विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव केके पाठक के आदेश पर उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।
शिक्षकों की एकता से मिली जीत
बर्खास्तगी के बाद शिक्षकों ने वंशीधर को तिरहुत स्नातक एमएलसी उपचुनाव में उम्मीदवार बनाया। यह सीट जेडीयू सांसद देवेश चंद्र ठाकुर के इस्तीफे से खाली हुई थी। शिक्षकों के समर्थन से वंशीधर ब्रजवासी ने चुनाव लड़ा और सभी दलों को मात देते हुए जीत हासिल की।
































