पटना: बिहार के भू एवं राजस्व मंत्री बड़े दावे करते हैं कि उन्होंने जमीन सर्वेक्षण की शुरुआत कर भूमि विवादों को कम किया है। वे यह भी कहते हैं कि जमीन से जुड़े सभी दस्तावेज अब ऑनलाइन उपलब्ध होंगे और इसके लिए टोल फ्री नंबर भी जारी किया जा रहा है। लेकिन जब इन दावों की वास्तविकता की जांच की जाती है, तो तस्वीर कुछ और ही होती है।
दरअसल, मंत्री और बिहार प्रदेश के प्रमुख दल के अध्यक्ष का दावा है कि पुराने जमीन दस्तावेजों को ऑनलाइन लाने की व्यवस्था की गई है। लेकिन ऐसा लगता है कि उन्हें नहीं पता या फिर वे जानने की कोशिश नहीं कर रहे कि उनके विभाग में क्या चल रहा है। एक ओर जहां वे दस्तावेजों को ऑनलाइन करने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी ही विभागीय फाइलें गायब हो रही हैं।
बिहार के विभिन्न जिलों, जैसे पटना, बक्सर और भागलपुर, से जमीन रजिस्ट्री के पुराने दस्तावेजों के गायब होने की शिकायतें आ रही हैं। सवाल यह है कि जब दस्तावेज ही नहीं होंगे, तो मंत्री किस बात का ऑनलाइन करेंगे?
जमीन सर्वे के कारण बड़ी संख्या में लोग निबंधन कार्यालयों में सत्यापित प्रतियों के लिए पहुंच रहे हैं, लेकिन उन्हें महीनों तक भी प्रतियां नहीं मिल रही हैं। इसके बावजूद मंत्री यह कहते हैं कि वे तेजी से काम कर रहे हैं। लेकिन एक महीने तक किसी कार्य का न होना सवाल उठाता है कि आखिर इतनी तेजी से काम करने का क्या फायदा है?
अधिकारी अभिलेखागार प्रबंधन का कहना है कि पुराने रिकॉर्ड जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं और उनका इंडेक्स तक नहीं किया गया है। कई अवर निबंधक भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि पूर्व कर्मचारियों ने कई जमीनों के रिकॉर्ड हटा दिए हैं। अब मंत्री से यह सवाल है कि जब रिकॉर्ड ही नहीं है, तो वे उसे वापस कैसे लाएंगे?
इसके अलावा, मंत्री ने दावा किया है कि ई-निबंधन सॉफ्टवेयर की मदद से लोग घर बैठे आवेदन कर सकते हैं और शुल्क भी जमा कर सकते हैं। उन्हें सिर्फ एक बार निबंधन कार्यालय आने की जरूरत पड़ेगी। लेकिन जब व्यवस्था ही सही नहीं है, तो आमजन उनके दावों पर कैसे विश्वास कर सकते हैं?
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