पटना: मणिपुर, जो भारतीय उत्तर-पूर्व का एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध राज्य है, इन दिनों गहरी उथल-पुथल का सामना कर रहा है। यहां की हिंसा, आगजनी और राजनीतिक संकट ने न सिर्फ राज्य बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। जानमाल की भारी हानि, विधायकों और मंत्रियों के घरों की आगजनी और सरकार के भीतर घमासान ने मणिपुर को देश के सामने एक गंभीर संकट में डाल दिया है।
हिंसा की वजह जातीय संघर्ष और राजनीतिक असंतोष
मणिपुर में हिंसा की जड़ जातीय संघर्ष और राजनीतिक असंतोष से जुड़ी हुई है। राज्य में दो प्रमुख जातीय समूह हैं मैतेई और कुकी। मैतेई समुदाय, जो मणिपुर घाटी में बसा है, मुख्यत हिंदू धर्म को मानने वाला है और सशक्त राजनीतिक दबदबा रखता है। वहीं, कुकी समुदाय आदिवासी है और आदिवासी क्षेत्रों में बसे हैं, जिनकी प्रमुखता मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में है। सिर्फ जातीय मतभेद ही नहीं, बल्कि सशस्त्र आंदोलन और राज्य सरकार के पक्ष में भी भारी राजनीतिक असंतोष सामने आया है। विशेष रूप से, मणिपुर के आदिवासी क्षेत्रों में संविधान में निर्धारित अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग ने हिंसा को हवा दी। इस विवाद ने मणिपुर को दो धड़ों में बांट दिया एक तरफ वे जो मैतेई समुदाय के लिए ST दर्जे के खिलाफ थे, तो दूसरी तरफ वे जो इस दर्जे को प्राप्त करने की मांग कर रहे थे।
जानमाल का नुकसान
मणिपुर में हुई हिंसा ने राज्य को गहरे संकट में डाल दिया है। अब तक सैकड़ों लोग मारे गए हैं, जबकि हजारों अन्य घायल हुए हैं। हिंसा ने न सिर्फ मानव जीवन को प्रभावित किया, बल्कि राज्य की संपत्ति को भी भारी नुकसान हुआ है। घरों, दुकानों और सार्वजनिक संपत्तियों की लूटपाट और आगजनी की घटनाओं ने मणिपुर की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को संकटग्रस्त बना दिया है। हजारों लोग निर्वासित हो चुके हैं और उन्हें अस्थायी शिविरों में शरण लेनी पड़ी है। राज्य सरकार और केंद्र सरकार की ओर से राहत प्रयास जारी हैं, लेकिन स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है।
विधायकों और मंत्रियों के आवास में आगजनी
राज्य के राजनीतिक संकट का एक बड़ा संकेत तब मिला, जब हिंसा के दौरान मणिपुर के विधायकों और मंत्रियों के आवासों में आगजनी की घटनाएं सामने आईं। यह न केवल एक संकेत था कि सत्ता की बागडोर में बैठे लोग भी सुरक्षित नहीं हैं, बल्कि यह भी दर्शाता है कि राजनीतिक असंतोष और विरोध कितना गहरा हो चुका है। विधायक और मंत्री अपने निजी आवासों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहे, और कई लोगों ने राजधानी इम्फाल से भागकर अन्य स्थानों पर शरण ली। आगजनी की घटनाओं ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी को उजागर किया है, जिससे राज्य में भय और अराजकता का माहौल पैदा हो गया।
बीजेपी के सहयोगी दल ने समर्थन वापस लिया
इस संकट के बीच, मणिपुर में सत्ता संभालने वाली भाजपा (BJP) सरकार के लिए मुश्किलें और बढ़ गईं। बीजेपी के सहयोगी दल, NPP (National People’s Party) ने सरकार पर आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह अपनी सरकार के भीतर और राज्य में स्थिति को काबू करने में नाकाम रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, NPP और अन्य छोटे सहयोगी दलों ने बीजेपी से अपना समर्थन वापस ले लिया। यह कदम राज्य में राजनीतिक संकट को और गहरा करता है। बीजेपी सरकार के भीतर बगावती सुर उठने लगे हैं, और पार्टी के भीतर भी नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की आलोचना बढ़ गई है, और कई नेताओं ने यह मांग की है कि स्थिति को संभालने के लिए नए नेतृत्व की जरूरत है।
कांग्रेस ने मोदी और शाह पर निशाना साधा
मणिपुर की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों को लेकर कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार पर कड़ा हमला बोला है। कांग्रेस के नेताओं ने मणिपुर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को जिम्मेदार ठहराया है। कांग्रेस का कहना है कि केंद्र सरकार ने मणिपुर की जटिल स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया और राज्य में असंतोष बढ़ने दिया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने मणिपुर को लेकर चुप्पी साधी हुई है और स्थिति को सुलझाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। उनके अनुसार, केंद्र सरकार ने न सिर्फ मणिपुर में शांति बनाए रखने में विफलता दिखाई है, बल्कि मणिपुर के लोगों की जान-माल की सुरक्षा को भी नजरअंदाज किया है।
मौजूदा हालात
मणिपुर का वर्तमान संकट गंभीर है और राज्य में अराजकता का माहौल जारी है। राज्य के कई हिस्सों में कर्फ्यू लगा हुआ है, जबकि सुरक्षा बलों की तैनाती भी बढ़ा दी गई है। बावजूद इसके, हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है। सड़कें सुनसान पड़ी हैं और लोग अपने घरों में डर-डर कर रह रहे हैं। मणिपुर विश्वविद्यालय और स्कूलों को बंद कर दिया गया है, और व्यापारी वर्ग भी अपनी दुकानों को बंद रखने को मजबूर हैं। राज्य में फंसे हुए लोगों के लिए प्रशासनिक मदद और राहत कार्य जारी हैं, लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा है, स्थिति और बिगड़ती जा रही है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और अन्य संगठनों ने राज्य में हो रही हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों पर चिंता जताई है और मणिपुर में शांति बहाली की मांग की है।
मणिपुर में हिंसा, आगजनी, राजनीतिक असंतोष और मानवाधिकार उल्लंघन के बीच, राज्य की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। केंद्र और राज्य सरकारों को इस संकट से निपटने के लिए तत्काल ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके अलावा, राज्य में जातीय और राजनीतिक असंतोष को शांत करने के लिए वार्ता और समझौते की जरूरत भी है। मणिपुर के लोग शांति, सुरक्षा और स्थिरता की उम्मीद में हैं, लेकिन तब तक राज्य के भीतर की यह उथल-पुथल जारी रहने की संभावना बनी हुई है।



































